तरुण शर्मा 'नि:शब्द', श्रीगंगानगर
खांसने के शोर से वो काल कोठरी ऐसे गूंज रही थी मानो कोई नक्कारखाना हो। बेचारी बूढ़ी शांति का खांस-खांस कर बुरा हाल हो चुका है। अभी एक साल हुआ है पति का इंतकाल हुए और अब बीमारी ने ऐसा घेरा कि खटिया पकड़ ली। दिनभर कोठरी में 'काला पानी' भोगती रहती है। फिर शाम होते ही घर की दहलीज पर डाल दी जाती है। जैसे घर का कोई बेजा सामान हो। यही उसकी दिनचर्या है।
रोज की तरह आज भी शांति रात को 'सर्वे भवंतु सुखिन:' की कामना करने के बाद सोच रही है, उन हसीन लम्हों के बारे में जो कभी जिए थे। रात का तीसरा पहर भी गुजर गया। वो अब भी जाग रही है। प्रभात वेला ठंडी हवा का झोंका लाया। इसी से चंद लम्हों की नींद नसीब हुई। सपने में बेटों का साया उसकी ओट बने हुए है मगर सूरज की पहली किरण ने तंद्रा तोड़ दी।
अरे! सुकून भरे साए में ये धूप कैसी ? बेटे कहां गए? सपने का सुखद एहसास जेहन में बरकरार था। कारण, धूप को रोकता सुयश का साया। वो भाइयों में सबसे छोटा है और अभी कुंवारा है। शायद तभी मां की आंख का तारा है।
शांति (कंठावरोध के कारण निमद भाव से)-बेटा, सुयश, तू तो यही है ना...
सुयश हामी भर देता है।
कहने को तो शांति के आठ बेटे हैं। सबसे बड़ा सत्या है। पेशे से मिस्त्री है। रौबदार व्यक्तित्व, अक्खड़ स्वभाव और जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने वाला। उसके लिए मां भी शर्त बनकर रह गई है। जीत गया तो मकान में हिस्सा मिल ही जाएगा। सबसे छोटा सुयश अभी 13 साल का है। अदनी देह, दिल का नरम और मां का सर्वस्व। सुयश से बड़ा बनवारी है। मां की हालत देखी नहीं जाती। तभी महीनों घर नहीं आता। मोहल्ले वाले बताते हैं कि उसकी भावनाएं मर चुकी हैं। गुंडा बन गया है। अब नशा और मारपीट ही उसका पेशा बन गया है। बाकी बेटे सेवा के बंटवारे के डर से बीवियों के कहने पर शहर ही छोड़ गए।
सत्या-आज गंगानगर जा रहा हूं। मकान देख रखा है। पेशगी दे दूंगा। वहीं रहेंगे। मैंने घर और बुढिय़ा को संभालने का ठेका थोड़े ही लिया है।
बिमला (सत्या की पत्नी)-मैं भी परेशान हो चुकी हूं। बुढिय़ा की सेवा कर कर के। राम जाने क्या बीमारी है? बच्चों को ही ना लग जाए। मरती भी नहीं।
सुयश नि:शब्द खड़ा है। सोच रहा है। दो रोटी पकाकर देना सेवा है... हम्म...
फिर सोचता है-ये चले गए तो मां का इलाज और घर का क्या होगा?
दो दिन बाद सत्या भी घर छोड़ कर शहर चला गया।
इधर, घर में कुछ दिन का राशन पेट में चला गया। वक्त की कारस्तानी ऐसी कि मासूम के हाथ में किताबों की जगह औजार आ गए। वो श्रीगंगानगर में ही सत्या के यहां 200 रुपए मासिक पगार पर काम करने लगा। काम में पूरी लग्न के चलते सालभर में ही ट्रेक्टर का इंजिन खोलना और बांधना सीख गया। मां की दवाई का भी खर्च था, सो तीन घंटे ज्यादा काम करता। सत्या 50 रुपए और दे देता।
एक रात सत्या का फोन घनघनाया-हेलो, सत्या बोल रहा हूं...
यश-भाजी, मैं यश, मां की हालत बिगड़ गई है। डॉक्टर ने कहा है बीकानेर ले जाना होगा। (सुबकते हुए) नहीं तो वो मर जाएगी।
सत्या-हां...हां... तो ले जाना, कल दोपहर बाद मत आना। पगार नहीं काटूंगा।
सुयश - भाई तुम नहीं आ...
सत्या (बीच में ही बात काटते हुए)-तो क्या साथ में मर जाएं बुड्ढ़ी के, धंधा छोड़ सिरहाने बैठ जाऊं तो क्या संजीवनी मिल जाएगी उसे।
सुयश भाई का मां के प्रति क्रूर कटाक्ष सुनकर आंसू बहाए जा रहा है।
सुयश सुबह आठ बजे ही सरपंच के ट्रेक्टर से मां को श्रीगंगानगर ले आया।
सत्या के घर का दरवाजा खटखटाया।
द्वार खुलते ही बिमला बोली-रे, करमजले बाहर ही रख बीमारी को, अंदर मत लाना।
मां की चारपाई को वहीं दहलीज पर छोड़ सुयश निर्लज्ज भाव से अपने आत्म सम्मान का खून कर दुकान की चाबी लेने मकान के भीतर चला जाता है।
सुयश-भाजी, चाबी दे दो।
सत्या-कित्ते बजे है बस?
सुयश-एक बजे (कुछ सोचकर) भाजी, थोड़े पैसे मिल जाते तो...
सत्या-हम्म... ऐसा कर दुकान पर एक इंजिन पड़ा है बोरिंग करने के लिए। काम करके, पैसा ले जाना।
सुयश भरे मन से दुकान के लिए जा रहा है।
सोच रहा है-मां तेरी हालत सहन नहीं हो रही। हे भगवान, इसे मौत दे दे या मुझे उठा ले।
इतने में रूलाई फूट गई।
उधर, घर पर मां धूप में ही पसीने से तर पड़ी है। चमड़ी सुर्ख हो चुकी है। यूं लग रहा था जैसे कोई जानवर किसी कसाई के बूचडख़ाने में तड़प रहा हो।
सत्या के बच्चे स्कूल से घर आते हैं।
हरीश (सत्या का बेटा)-मां दादी मां आई है।
बिमला-खबरदार, जो बुढिय़ा के पास भी फटके तो, बीमारी का घर है वो, कान के नीचे लगाऊंगी।
चलो कमरों में धूप बहुत तेज है।
हरीश-पर मां, दादी भी तो धूप में ही लेटी हुई है। उन्हें भी तो अंदर बुुला लो।
तड़ाक... जोरदार थप्पड़ की गूंज से सन्नाटा छा जाता है।
सभी बच्चे कमरे में चले जाते हैं।
दुकान पर सुयश ने बारह बजे ही काम खत्म कर दिया और मां को बस की पिछली सीट पर लेटाकर बीकानेर के लिए रवाना हो गया। कुछ दूरी तय करने के बाद अचानक दर्द से कराहती हुई मां शांत हो जाती है।
सुयश-भगवान का शुक्र है मां को नींद आ गई।
मगर सुयश को नामालूम था कि मां अब कभी ना उठने के लिए हमेशा के लिए सो चुकी है। जब पता चला तो वो भी बेहोश हो गया। उसे होश आया तो भीड़ उसे घेरे खड़ी थी। अगले बस अड्डे पर वो मां की पार्थिव देह के साथ उतर गया।
धूप में घुटने के बल बैठा मां की देह को छांव दे रहा था। हिम्मत करके एक ऑटो को किराए पर लेकर वो वापिस हो गया। ऑटो 50-60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रहा था और सफर था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। रास्ते में बहती नदियों में कुलांचे मारता पानी उसे गतिहीन लगने लगा। हवा बहरी और आकाश भी गूंगा प्रतीत हो रहा था।
श्रीगंगानगर पहुंच कर सत्या के घर पहुंचा तो बिमला बोली गांव ले जा बुढिय़ा को, शुक्र है मर गई...
बिमला बड़बड़ाए जा रही है।
सत्या दु:खी लग रहा था मगर मन के कोने में भी कहीं सुकून ही नजर आ रहा था। फायदेभरा सुकून।
सुयश के सब्र का बांध आखिर टूट ही गया। वो बोला-भाभी कुछ तो शर्म करो। भगवान ना करे कभी तुम्हे भी ऐसे दिन देखने पड़ें।
ऐसा कहकर सुयश सफेद चादर से लिपटे मां के मुर्दा शरीर को गांव ले आया। सभी भाई अंतिम क्रिया के लिए पहुंच गए। बनवारी यहां भी नहीं आया था। इधर कर्मकांड हो रहा था और उधर सत्या-बिमला की गुफ्तगू जारी थी।
पगड़ी की रस्म के बाद सत्या तानाशाह शासक की तरह बोला-अब मैं मुखिया हूं। पुश्तैनी मकान का बंटवारा करना ही सही रहेगा। आखिर मां का वो घर भी तोड़ दिया गया। बंटवारे के बाद सभी हिस्सेदार अपने घरों को चले गए।
25 साल गुजरने के बाद यही आपबीती सुयश अपने बच्चों को सुना रहा था।
बेटा बोला-पापा इसके बाद क्या हुआ?
सुयश-उसके बाद मैं लुधियाना आ गया। उन लोगों का पता नहीं। हां, सत्या भाजी का मझोला बेटा हरीश मिला था। बता रहा था कि उनकी तबीयत खराब रहती है। मिलना चाहते हैं आपसे। आज मेरा मन हो रहा है भाजी से मिलने का।
बेटा-इतना सब होने के बाद भी।
सुयश कुछ नहीं बोला। उसे मां की मंगल कामना याद आ गई। सर्वे भवंतु सुखिन: मतलब सभी सुखी रहें।
अगले ही दिन वो लुधियाना से गंगानगर पहुंच गया। बीता हुआ एक-एक क्षण फिर से आंखों के सामने तैरने लगे। सत्या के घर के पास पहुंचा तो यूं लगा मां की चारपाई सत्या के घर की दहलीज पर वैसे ही पड़ी है।
पास पहुंचा तो भौचक्क रह गया। चारपाई दहलीज पर पड़ी थी मगर किरदार कोई और था।
वो चौंका-अरे, ये तो बिमला है।
आज बिमला धूप में पसीने से सराबोर चारपाई पर अद्र्धमूर्छित अवस्था में लेटी है। चारपाई की चादर विष्ठा (मल) तथा मूत्र से मैली हो चुकी है। लागर देह किसी भयावह कंकाल सी नजर आ रही है। कपड़े भी फटे हुए हैं। प्रथम दृष्टया कोई भी पागल ही समझेगा।
उसे देखते ही सुयश के मुंह से निकला-हे भगवान...
परिचित आवाज और शब्दों को सुनकर बिमला सुयश की ओर पलटी। उसे देखते ही बिमला के कानों में वही शब्द गूंज उठे। 'भगवान ना करे कभी तुम्हे भी ऐसे दिन देखने पड़ें।Ó
अंदर पहुंचा तो सत्या की मझोली बहू सामने आई और बोली-हां जी...
सुयश-मैं सुयश शर्मा, लुधियाना से... तुम्हारे ससुर का छोटा भाई।
छोटी बहू ने प्रणाम किया। अंदर बिठाया। पूछने पर बताया कि ससुर जी की कैंसर के कारण टांग कटवानी पड़ी। घर का बंटवारा हो जाने के कारण सभी बेटों ने उनसे किनारा कर लिया। पैसों की कमी ने उन्हें और क्षुब्ध कर दिया। हमने हिस्से के रुपए देकर ये मकान खरीद लिया। ससुर जी एक साल बाद चल बसे।
सुयश-और बिमला भाभी...
बहू-ससुर जी की मौत ने उन्हें दिमागी तौर पर बीमार कर दिया। कभी बुदबुदाने लगती है। कभी रोते-रोते हंसने। संभालना मुश्किल हो रहा है। बड़े भाई तो चडीगढ़ चले गए। छोटा आवारा घूमता रहता है। घर तो कभी का छोड़ चुका है।
घर से बाहर आते हुए सुयश को सत्या का मझोला बेटा भी मिल गया। ये तो हरीश है। परिवार में यही संस्कारी था।
सुयश-बेटा, भगवान की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती। हां, इतिहास खुद को दोहरा कर ही रहता है।
बिमला चारपाई पर पड़ी सब बातें सुन रही थी। सुयश को रात की बस से लुधियाना के लिए निकलना था। वो अन्य पहचान वालों से मिलने चला गया।
उस रात बिमला यही बुदबुदाती रही-इतिहास खुद को दोहराता है। भगवान से डरो।
शायद यही शब्द उसको पश्चाताप की आग में जला रहे थे। अलसुबह बिमला की आत्मा शरीर छोड़ चुकी थी।
हरीश ने सुयश को फोन किया। वो फिर से श्रीगंगानगर आया। बिमला के दूसरे बेटे भी वहीं थे, जो सत्या-बिमला की बची नाममात्र की संपत्ति और मां के बीमे की राशि के लिए लड़ रहे थे।
हरीश (दोनों को डांटते हुए)-सेवा के वक्त तो कोई आया नहीं, अपना हिस्सा लेकर चलते बने। किसी को कुछ नहीं मिलेगा।
सुयश ने कहा-मेरी बात मानो, कर्मकांड के खर्च के बाद बचे पैसों को भी किसी धर्म के काम में ही लगा दो। बुजुर्ग की सलाह पर तीनों राजी हो गए। कुछ दिन वहां रहने के बाद सुयश स्टैण्ड पर बस का इंतजार कर रहा था।
तभी एक अजनबी ने कहा-वाह! भाई साहब, संतान हो तो ऐसी। देखो तो जनता के लिए मां के नाम से वाटर कूलर लगावाया। भगवान ऐसी औलाद सब को दे।
उसने पढ़ा-यह वाटर कूलर श्रीमती बिमला देवी पत्नी श्री सत्या शर्मा की स्मृति में उनके बेटों फलां-फलां-फलां ने लगवाया है।
सुयश (विस्मित भाव से)-क्या ऐसी औलाद भगवान से हर कोई चाहेगा?
वो सोच रहा है-बेटों के इस व्यवहार के लिए कौन जिम्मेदार है? समाज स्वयं, समय या संस्कार।
बस कंडक्टर आवाज देता है। अबोहर, मलोट, मुक्तसर, मोगा, लुधियाना... सुयश बस पर चढ़ जाता है।
खांसने के शोर से वो काल कोठरी ऐसे गूंज रही थी मानो कोई नक्कारखाना हो। बेचारी बूढ़ी शांति का खांस-खांस कर बुरा हाल हो चुका है। अभी एक साल हुआ है पति का इंतकाल हुए और अब बीमारी ने ऐसा घेरा कि खटिया पकड़ ली। दिनभर कोठरी में 'काला पानी' भोगती रहती है। फिर शाम होते ही घर की दहलीज पर डाल दी जाती है। जैसे घर का कोई बेजा सामान हो। यही उसकी दिनचर्या है।
रोज की तरह आज भी शांति रात को 'सर्वे भवंतु सुखिन:' की कामना करने के बाद सोच रही है, उन हसीन लम्हों के बारे में जो कभी जिए थे। रात का तीसरा पहर भी गुजर गया। वो अब भी जाग रही है। प्रभात वेला ठंडी हवा का झोंका लाया। इसी से चंद लम्हों की नींद नसीब हुई। सपने में बेटों का साया उसकी ओट बने हुए है मगर सूरज की पहली किरण ने तंद्रा तोड़ दी।
अरे! सुकून भरे साए में ये धूप कैसी ? बेटे कहां गए? सपने का सुखद एहसास जेहन में बरकरार था। कारण, धूप को रोकता सुयश का साया। वो भाइयों में सबसे छोटा है और अभी कुंवारा है। शायद तभी मां की आंख का तारा है।
शांति (कंठावरोध के कारण निमद भाव से)-बेटा, सुयश, तू तो यही है ना...
सुयश हामी भर देता है।
कहने को तो शांति के आठ बेटे हैं। सबसे बड़ा सत्या है। पेशे से मिस्त्री है। रौबदार व्यक्तित्व, अक्खड़ स्वभाव और जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने वाला। उसके लिए मां भी शर्त बनकर रह गई है। जीत गया तो मकान में हिस्सा मिल ही जाएगा। सबसे छोटा सुयश अभी 13 साल का है। अदनी देह, दिल का नरम और मां का सर्वस्व। सुयश से बड़ा बनवारी है। मां की हालत देखी नहीं जाती। तभी महीनों घर नहीं आता। मोहल्ले वाले बताते हैं कि उसकी भावनाएं मर चुकी हैं। गुंडा बन गया है। अब नशा और मारपीट ही उसका पेशा बन गया है। बाकी बेटे सेवा के बंटवारे के डर से बीवियों के कहने पर शहर ही छोड़ गए।
सत्या-आज गंगानगर जा रहा हूं। मकान देख रखा है। पेशगी दे दूंगा। वहीं रहेंगे। मैंने घर और बुढिय़ा को संभालने का ठेका थोड़े ही लिया है।
बिमला (सत्या की पत्नी)-मैं भी परेशान हो चुकी हूं। बुढिय़ा की सेवा कर कर के। राम जाने क्या बीमारी है? बच्चों को ही ना लग जाए। मरती भी नहीं।
सुयश नि:शब्द खड़ा है। सोच रहा है। दो रोटी पकाकर देना सेवा है... हम्म...
फिर सोचता है-ये चले गए तो मां का इलाज और घर का क्या होगा?
दो दिन बाद सत्या भी घर छोड़ कर शहर चला गया।
इधर, घर में कुछ दिन का राशन पेट में चला गया। वक्त की कारस्तानी ऐसी कि मासूम के हाथ में किताबों की जगह औजार आ गए। वो श्रीगंगानगर में ही सत्या के यहां 200 रुपए मासिक पगार पर काम करने लगा। काम में पूरी लग्न के चलते सालभर में ही ट्रेक्टर का इंजिन खोलना और बांधना सीख गया। मां की दवाई का भी खर्च था, सो तीन घंटे ज्यादा काम करता। सत्या 50 रुपए और दे देता।
एक रात सत्या का फोन घनघनाया-हेलो, सत्या बोल रहा हूं...
यश-भाजी, मैं यश, मां की हालत बिगड़ गई है। डॉक्टर ने कहा है बीकानेर ले जाना होगा। (सुबकते हुए) नहीं तो वो मर जाएगी।
सत्या-हां...हां... तो ले जाना, कल दोपहर बाद मत आना। पगार नहीं काटूंगा।
सुयश - भाई तुम नहीं आ...
सत्या (बीच में ही बात काटते हुए)-तो क्या साथ में मर जाएं बुड्ढ़ी के, धंधा छोड़ सिरहाने बैठ जाऊं तो क्या संजीवनी मिल जाएगी उसे।
सुयश भाई का मां के प्रति क्रूर कटाक्ष सुनकर आंसू बहाए जा रहा है।
सुयश सुबह आठ बजे ही सरपंच के ट्रेक्टर से मां को श्रीगंगानगर ले आया।
सत्या के घर का दरवाजा खटखटाया।
द्वार खुलते ही बिमला बोली-रे, करमजले बाहर ही रख बीमारी को, अंदर मत लाना।
मां की चारपाई को वहीं दहलीज पर छोड़ सुयश निर्लज्ज भाव से अपने आत्म सम्मान का खून कर दुकान की चाबी लेने मकान के भीतर चला जाता है।
सुयश-भाजी, चाबी दे दो।
सत्या-कित्ते बजे है बस?
सुयश-एक बजे (कुछ सोचकर) भाजी, थोड़े पैसे मिल जाते तो...
सत्या-हम्म... ऐसा कर दुकान पर एक इंजिन पड़ा है बोरिंग करने के लिए। काम करके, पैसा ले जाना।
सुयश भरे मन से दुकान के लिए जा रहा है।
सोच रहा है-मां तेरी हालत सहन नहीं हो रही। हे भगवान, इसे मौत दे दे या मुझे उठा ले।
इतने में रूलाई फूट गई।
उधर, घर पर मां धूप में ही पसीने से तर पड़ी है। चमड़ी सुर्ख हो चुकी है। यूं लग रहा था जैसे कोई जानवर किसी कसाई के बूचडख़ाने में तड़प रहा हो।
सत्या के बच्चे स्कूल से घर आते हैं।
हरीश (सत्या का बेटा)-मां दादी मां आई है।
बिमला-खबरदार, जो बुढिय़ा के पास भी फटके तो, बीमारी का घर है वो, कान के नीचे लगाऊंगी।
चलो कमरों में धूप बहुत तेज है।
हरीश-पर मां, दादी भी तो धूप में ही लेटी हुई है। उन्हें भी तो अंदर बुुला लो।
तड़ाक... जोरदार थप्पड़ की गूंज से सन्नाटा छा जाता है।
सभी बच्चे कमरे में चले जाते हैं।
दुकान पर सुयश ने बारह बजे ही काम खत्म कर दिया और मां को बस की पिछली सीट पर लेटाकर बीकानेर के लिए रवाना हो गया। कुछ दूरी तय करने के बाद अचानक दर्द से कराहती हुई मां शांत हो जाती है।
सुयश-भगवान का शुक्र है मां को नींद आ गई।
मगर सुयश को नामालूम था कि मां अब कभी ना उठने के लिए हमेशा के लिए सो चुकी है। जब पता चला तो वो भी बेहोश हो गया। उसे होश आया तो भीड़ उसे घेरे खड़ी थी। अगले बस अड्डे पर वो मां की पार्थिव देह के साथ उतर गया।
धूप में घुटने के बल बैठा मां की देह को छांव दे रहा था। हिम्मत करके एक ऑटो को किराए पर लेकर वो वापिस हो गया। ऑटो 50-60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रहा था और सफर था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। रास्ते में बहती नदियों में कुलांचे मारता पानी उसे गतिहीन लगने लगा। हवा बहरी और आकाश भी गूंगा प्रतीत हो रहा था।
श्रीगंगानगर पहुंच कर सत्या के घर पहुंचा तो बिमला बोली गांव ले जा बुढिय़ा को, शुक्र है मर गई...
बिमला बड़बड़ाए जा रही है।
सत्या दु:खी लग रहा था मगर मन के कोने में भी कहीं सुकून ही नजर आ रहा था। फायदेभरा सुकून।
सुयश के सब्र का बांध आखिर टूट ही गया। वो बोला-भाभी कुछ तो शर्म करो। भगवान ना करे कभी तुम्हे भी ऐसे दिन देखने पड़ें।
ऐसा कहकर सुयश सफेद चादर से लिपटे मां के मुर्दा शरीर को गांव ले आया। सभी भाई अंतिम क्रिया के लिए पहुंच गए। बनवारी यहां भी नहीं आया था। इधर कर्मकांड हो रहा था और उधर सत्या-बिमला की गुफ्तगू जारी थी।
पगड़ी की रस्म के बाद सत्या तानाशाह शासक की तरह बोला-अब मैं मुखिया हूं। पुश्तैनी मकान का बंटवारा करना ही सही रहेगा। आखिर मां का वो घर भी तोड़ दिया गया। बंटवारे के बाद सभी हिस्सेदार अपने घरों को चले गए।
25 साल गुजरने के बाद यही आपबीती सुयश अपने बच्चों को सुना रहा था।
बेटा बोला-पापा इसके बाद क्या हुआ?
सुयश-उसके बाद मैं लुधियाना आ गया। उन लोगों का पता नहीं। हां, सत्या भाजी का मझोला बेटा हरीश मिला था। बता रहा था कि उनकी तबीयत खराब रहती है। मिलना चाहते हैं आपसे। आज मेरा मन हो रहा है भाजी से मिलने का।
बेटा-इतना सब होने के बाद भी।
सुयश कुछ नहीं बोला। उसे मां की मंगल कामना याद आ गई। सर्वे भवंतु सुखिन: मतलब सभी सुखी रहें।
अगले ही दिन वो लुधियाना से गंगानगर पहुंच गया। बीता हुआ एक-एक क्षण फिर से आंखों के सामने तैरने लगे। सत्या के घर के पास पहुंचा तो यूं लगा मां की चारपाई सत्या के घर की दहलीज पर वैसे ही पड़ी है।
पास पहुंचा तो भौचक्क रह गया। चारपाई दहलीज पर पड़ी थी मगर किरदार कोई और था।
वो चौंका-अरे, ये तो बिमला है।
आज बिमला धूप में पसीने से सराबोर चारपाई पर अद्र्धमूर्छित अवस्था में लेटी है। चारपाई की चादर विष्ठा (मल) तथा मूत्र से मैली हो चुकी है। लागर देह किसी भयावह कंकाल सी नजर आ रही है। कपड़े भी फटे हुए हैं। प्रथम दृष्टया कोई भी पागल ही समझेगा।
उसे देखते ही सुयश के मुंह से निकला-हे भगवान...
परिचित आवाज और शब्दों को सुनकर बिमला सुयश की ओर पलटी। उसे देखते ही बिमला के कानों में वही शब्द गूंज उठे। 'भगवान ना करे कभी तुम्हे भी ऐसे दिन देखने पड़ें।Ó
अंदर पहुंचा तो सत्या की मझोली बहू सामने आई और बोली-हां जी...
सुयश-मैं सुयश शर्मा, लुधियाना से... तुम्हारे ससुर का छोटा भाई।
छोटी बहू ने प्रणाम किया। अंदर बिठाया। पूछने पर बताया कि ससुर जी की कैंसर के कारण टांग कटवानी पड़ी। घर का बंटवारा हो जाने के कारण सभी बेटों ने उनसे किनारा कर लिया। पैसों की कमी ने उन्हें और क्षुब्ध कर दिया। हमने हिस्से के रुपए देकर ये मकान खरीद लिया। ससुर जी एक साल बाद चल बसे।
सुयश-और बिमला भाभी...
बहू-ससुर जी की मौत ने उन्हें दिमागी तौर पर बीमार कर दिया। कभी बुदबुदाने लगती है। कभी रोते-रोते हंसने। संभालना मुश्किल हो रहा है। बड़े भाई तो चडीगढ़ चले गए। छोटा आवारा घूमता रहता है। घर तो कभी का छोड़ चुका है।
घर से बाहर आते हुए सुयश को सत्या का मझोला बेटा भी मिल गया। ये तो हरीश है। परिवार में यही संस्कारी था।
सुयश-बेटा, भगवान की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती। हां, इतिहास खुद को दोहरा कर ही रहता है।
बिमला चारपाई पर पड़ी सब बातें सुन रही थी। सुयश को रात की बस से लुधियाना के लिए निकलना था। वो अन्य पहचान वालों से मिलने चला गया।
उस रात बिमला यही बुदबुदाती रही-इतिहास खुद को दोहराता है। भगवान से डरो।
शायद यही शब्द उसको पश्चाताप की आग में जला रहे थे। अलसुबह बिमला की आत्मा शरीर छोड़ चुकी थी।
हरीश ने सुयश को फोन किया। वो फिर से श्रीगंगानगर आया। बिमला के दूसरे बेटे भी वहीं थे, जो सत्या-बिमला की बची नाममात्र की संपत्ति और मां के बीमे की राशि के लिए लड़ रहे थे।
हरीश (दोनों को डांटते हुए)-सेवा के वक्त तो कोई आया नहीं, अपना हिस्सा लेकर चलते बने। किसी को कुछ नहीं मिलेगा।
सुयश ने कहा-मेरी बात मानो, कर्मकांड के खर्च के बाद बचे पैसों को भी किसी धर्म के काम में ही लगा दो। बुजुर्ग की सलाह पर तीनों राजी हो गए। कुछ दिन वहां रहने के बाद सुयश स्टैण्ड पर बस का इंतजार कर रहा था।
तभी एक अजनबी ने कहा-वाह! भाई साहब, संतान हो तो ऐसी। देखो तो जनता के लिए मां के नाम से वाटर कूलर लगावाया। भगवान ऐसी औलाद सब को दे।
उसने पढ़ा-यह वाटर कूलर श्रीमती बिमला देवी पत्नी श्री सत्या शर्मा की स्मृति में उनके बेटों फलां-फलां-फलां ने लगवाया है।
सुयश (विस्मित भाव से)-क्या ऐसी औलाद भगवान से हर कोई चाहेगा?
वो सोच रहा है-बेटों के इस व्यवहार के लिए कौन जिम्मेदार है? समाज स्वयं, समय या संस्कार।
बस कंडक्टर आवाज देता है। अबोहर, मलोट, मुक्तसर, मोगा, लुधियाना... सुयश बस पर चढ़ जाता है।
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